"पापा की साइकिल, मेला और वो चोट — एक बेटी की यादों से"
पापा की साइकिल, मेला और वो चोट — एक बेटी की यादों से
बचपन के कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो उम्र भर हमारे दिल में बस जाते हैं।
मैं आज भी भूल नहीं पाई वो दशहरे का दिन...
मैं करीब 7 साल की थी, मेरा छोटा भाई 4 साल का। गांव के दशहरे मेले का इंतज़ार हम हफ्तों पहले से करने लगते थे।
हमारे पापा प्राइवेट स्कूल में टीचर थे।
ज़्यादा आमदनी नहीं थी, लेकिन हर साल वो जतन करके हमें नए कपड़े ज़रूर दिलाते थे।
अब सोचती हूं तो लगता है — वो बस कपड़े नहीं थे, वो उनका प्यार, त्याग और कोशिश थी।
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मेला वाले दिन,
पापा ने अपनी पुरानी साइकिल निकाली।
मुझे पीछे बिठाया, और भाई को आगे, हैंडल पर गमछे की सीट बना दी।
हम तीनों साइकिल पर निकले — मन में उत्साह, चेहरे पर खुशी।
मेले में खूब मज़ा आया — केले खाए, मिठाइयाँ लीं, गोले, चूड़ा और रेवड़ी खरीदी।
रामलीला देखी — और जैसे ही रामजी ने रावण का वध किया,
हम घर लौटने लगे।
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तब हुआ वो पल... जो आज भी आँखें नम कर देता है।
गांव की टूटी सड़क पर अचानक साइकिल का संतुलन बिगड़ गया।
पापा हमें गिरने से बचाने में खुद गिर पड़े।
उनका पैर मुड़ गया, बहुत तेज़ चोट आई थी।
लेकिन जैसे ही गिर पड़े — पहली आवाज़ यही थी:
> "मोना... मोहित ठीक हो ना? कहीं चोट तो नहीं लगी?"
मैंने और भाई ने कहा — "हम ठीक हैं पापा।"
पर सच्चाई ये थी — पापा को बहुत दर्द था,
लेकिन उन्हें सिर्फ हमारी चिंता थी।
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आज जब लोग माँ के बलिदान पर लिखते हैं (जो बिल्कुल सच है),
तो मैं पूछती हूँ —
पिता ने क्या कम सहा है?
वो साइकिल की सवारी नहीं थी,
वो हमारी छोटी-सी दुनिया थी —
जिसे हमारे पिता हर साल अपने कंधों पर चलाकर सजाते थे।
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❤️ मेरे पापा, आप सच में महान हो।
आपका हर त्याग, हर चोट — मेरी ज़िंदगी की ताक़त बन गया है।
आज भी जब मुश्किल आती है, तो याद आता है —
> "जिस पापा ने गिरकर भी हमें संभाला, हम तो बस लड़खड़ाए हैं..."

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