एक गांव की लड़की... और उसके सपनों की उधड़ी सिलाई
एक गांव की लड़की... और उसके सपनों की उधड़ी सिलाई
मैं मोनिका हूं। एक साधारण सी लड़की, जिसने कभी सोचा था कि मैं सबसे अलग हूं। स्कूल में जब अच्छे नंबर आते थे, तो लगता था – क्या है जो मैं नहीं कर सकती? लगता था मैं तो हर फील्ड की स्टार बन सकती हूं। तब समझ ही नहीं थी कि ये जो चमक है, वो सिर्फ गांव की चार दीवारों में थी। बाहर की दुनिया बहुत बड़ी थी... और बहुत सख्त भी।
जब हकीकत से सामना हुआ…
स्कूल खत्म हुआ और मैं डिप्लोमा करने शहर आई। पूरे उत्तर प्रदेश के हर जिले से लड़कियां वहां आई थीं – कोई फैशन टेक्सटाइल से, कोई आईटी से, और मैं इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड में। उस भीड़ में खड़ी हुई पहली बार खुद को छोटा महसूस किया।
मैंने तब जाना कि किताबों में जो पढ़ा था, वो असल जिंदगी में अधूरा था। थ्योरी तो सिखाई गई, लेकिन प्रैक्टिकल की दुनिया में हम खो से गए। फिर भी... सीखा, समझा... धीरे-धीरे ही सही।
दिल्ली का दर्पण – जब खुद को और गहराई से देखा
कुछ सालों बाद जब नौकरी के लिए दिल्ली पहुंची, तब लगा जैसे फिर से मेरी असलियत सामने खड़ी है। वहां ऑफिस में कॉन्फिडेंस और खूबसूरती से भरी लड़कियां थीं। और मैं? एक सीधी-सादी गांव की लड़की, जिसे कुछ लोगों ने ताना भी मारे – ‘गंवार’ कहकर।
लेकिन सच कहूं... मुझे फर्क पड़ा। क्योंकि मैं अंदर ही अंदर खुद से पूछने लगी – “क्या मैं वाकई कुछ भी नहीं हूं?” ना पर्सनैलिटी, ना ग्लैमर, ना ही कम्प्यूटर की समझ। बस सीधी बात, सच्चा दिल... लेकिन ये सब आज के कॉर्पोरेट कल्चर में कम ही मायने रखता है।
मैं औसत क्यों हूं? मैं पीछे क्यों हूं?
आज भी जब खुद को देखती हूं, तो सोचती हूं – क्या मैं हमेशा "average" ही रहूंगी? क्यों मैं उतनी स्मार्ट नहीं दिखती? क्यों हर फील्ड में मैं बस ठीक-ठाक सी हूं? क्यों सीख कर भी मैं पीछे हूं?
पर फिर सोचती हूं... कि शायद मैं पीछे नहीं, बल्कि **वो हूं जो किसी भी दिखावे से परे है।** वो जो अपनी सच्चाई के साथ जी रही है। और शायद यही मेरी असली खूबसूरती है।
शब्द ही मेरी पहचान बनेंगे…
आज मैं अपने ब्लॉग से फिर से जीना सीख रही हूं। जो भी मैं महसूस करती हूं, वो लिखती हूं। जो जिया है – वो ही मेरी कहानी है। और अगर मेरी ये बातें किसी एक लड़की को भी उम्मीद दे जाए, तो शायद मैं हार नहीं रही... जी रही हूं। धीरे-धीरे... लेकिन सच के साथ।
शायद मैं अब भी "perfect" नहीं हूं… लेकिन अब मैं "खुद" हूं। और यही मेरी जीत है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें