"Paisa ke Peechhe Daudta Insaan – Sukoon Ki Talaash Mein Ek Sachchi Nazar"
(लेखिका की कलम से - Apni Pehchaan)
कभी सोचा है इंसान ने,
कि वो आख़िर जा कहाँ रहा है?
हर वक़्त भागता ही रहता है,
मगर खुद से ही दूर जा रहा है।
सुबह से शाम तक,
बस एक ही चर्चा — पैसा, पैसा...
बचपन छूट गया, रिश्ते टूट गए,
फिर भी दिल कहे — थोड़ा और पैसा।
वो शामें जो छत पर गुज़री थीं,
अब छतें भी गिरवी रख दीं।
वो हँसी जो दिल से आती थी,
अब स्टेटस में दिखती हैं, नकली सी।
कभी माँ के आँचल में सुकून था,
अब महंगे रेज़ॉर्ट्स में भी बेचैनी सी।
कभी पापा की उंगली पकड़कर चला करते थे,
अब उन्हें व्हाट्सएप पर भी "टाइम नहीं" लिखते हैं।
सवाल ये नहीं कि पैसा बुरा है,
सवाल ये है — क्या सिर्फ पैसा ही ज़रूरी है?
क्या वक़्त, प्यार, रिश्ते, एहसास —
इनका कोई मोल नहीं अब इस दौड़ में?
कहाँ ले जाएगा ये पैसा तुझे, ऐ इंसान?
जब तेरा अपना दिल ही तुझसे अनजान?
थोड़ा रुक, थोड़ा जी, थोड़ा मुस्कुरा,
कभी अपनों के साथ बिना वजह बैठ के देख,
हो सकता है वहाँ वो सुकून मिल जाए,
जो करोड़ों में भी न मिला हो आज तक।
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